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…कटान पीड़ित तीन दशक से गुजार रहे गुरबत की जिंदगी

-दर्द कटान पीड़ितों का

-नेशनल हाईवे के किनारे तीन दशक से डर के साए में रहना बन गई नीयती

शशिकांत ओझा (बलिया)

मुंह की बात सुने हर कोई 

दिल के दर्द को जाने कौन। 

आवाजों के बाजारों में 

खामोशी पहचाने कौन।

निदा फ़ाज़ली की उक्त पंक्तियां जिले के विकास खंड सोहांव अन्तर्गत ग्राम सभा कुल्हड़िया निवासी उन अभागों पर बिल्कुल सटीक बैठती है, जो गंगा की लहरों में सब कुछ गवाने के बाद लगभग तीन दशक से गुरबत की जिंदगी गुजार रहे हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 के किनारे दरियापुर, तेतारपुर और करंजा मौजे में अभावग्रस्त जिंदगी डर के साए में जीने को मजबूर हैं। ऐसे लोग अपने भाग्य पर आंशू बहाते हुए सरकार द्वारा चलाई जा रही जन कल्याणकारी योजनाओं को आइना दिखा रहे हैं।

वर्ष 1991 में गंगा की लहरों में अपना घर द्वार सब कुछ गवां चुके यह लोग सड़क किनारे अपना आशियाना यही सोचकर बनाए होंगे की सब कुछ तो नहीं मिल सकता लेकिन किसी हाकिम या जनप्रतिनिधि की नजरें इनायत हो जाए तो शायद रहने के लिए कुछ जमीन जरूर मिल जाएगी। जमीन की तो बात ही छोड़िए  इन मजदूरों को दो वक्त की रोटी भी बमुश्किल कड़ी मेहनत से ही मिल पाती है। गुरबत की जिंदगी गुजार रहे इन अभागों को गांव की पहचान तो पंचायत चुनाव में मिल गई, कुछ लोगों को ग्राम सभा करंजा तो कुछ लोगों को तेतारपुर ग्राम सभा में जोड़ दिया गया।  लेकिन अभी भी इन लोगों को बसने के लिए जमीन की व्यवस्था किसी स्तर पर नहीं की जा सकी है। उसी तरह सड़क किनारे हर साल बरसात के दिनों में बाढ़ और गर्मी के दिनों में भंयकर लूं के थपेड़े झेलते हुए फूस की झोपड़ी में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं।

इस संबंध में पूछने पर ग्राम प्रधान करंजा जयप्रकाश यादव ने कहा कि हमारे ग्राम सभा में इन लोगों को बसाने के लिए जमीन की व्यवस्था नहीं है। उच्चाधिकारियों से मिलकर बसने के लिए जमीन की मांग की जाएगी ताकि इन लोगों को सड़क किनारे से हटकर रहने की व्यवस्था हो सके। ग्राम प्रधान तेतारपुर विजय नारायण राजभर ने कहा कि सड़क किनारे बसे इन लोगों को बसने के लिए जमीन की मांग अधिकारियों से की गई थी। लेकिन अब तक व्यवस्था नहीं हो सकी है। फिर इसके लिए अधिकारियों से मिलकर प्रयास किया जाएगा।