
-विशेषज्ञ की राय | मानसिक स्वास्थ्य
-शिक्षा व्यवस्था के साथ परिवार और समाज को भी युवाओं का भावनात्मक संबल बनना होगा

शशिकांत ओझा
बलिया : किसी परीक्षा में कथित अनियमितता या पेपर लीक जैसी घटना अपने आप में आत्महत्या का प्रत्यक्ष कारण नहीं मानी जा सकती। मनोविज्ञान के अनुसार आत्महत्या प्रायः अनेक मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक कारकों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम होती है। उक्त कहना है मानसिक रोग एवं न्यूरो विशेषज्ञ डा. डीबी तिवारी का।

डा. तिवारी का कहना है कि तीव्र मानसिक तनाव, असफलता का भय, भविष्य को लेकर निराशा, सामाजिक तुलना, पारिवारिक अपेक्षाओं का दबाव, पूर्णतावादी सोच, भावनात्मक अकेलापन तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ किसी भी छात्र को गहरे अवसाद की ओर ले जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी परीक्षा को दोबारा आयोजित करने का अवसर भी उपलब्ध हो, तब भी कई छात्र यह महसूस कर सकते हैं कि उनका परिश्रम व्यर्थ हो गया, वे परिवार की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाएँगे या उनका भविष्य अंधकारमय हो गया है। ऐसे में वास्तविक समस्या केवल परीक्षा नहीं, बल्कि उससे जुड़ी मानसिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया होती है।

डा. तिवारी के अनुसार यदि बड़ी संख्या में छात्र आत्महत्या जैसा कदम उठाते हैं तो इसे केवल परीक्षा प्रणाली की विफलता या केवल व्यक्तिगत कमजोरी कहकर नहीं समझा जा सकता। यह शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकीय अपेक्षाओं, सामाजिक प्रतिस्पर्धा, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी तथा भावनात्मक सहारे के अभाव जैसे अनेक पहलुओं पर गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता को दर्शाता है। डा. तिवारी का कहना है कि कि युवाओं को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए ही नहीं, बल्कि असफलता, अनिश्चितता और संघर्ष का सामना करने के लिए भी मानसिक रूप से तैयार करना होगा। परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार सभी की साझा जिम्मेदारी है कि ऐसा वातावरण बनाया जाए, जहाँ कोई भी छात्र कठिन परिस्थितियों में स्वयं को अकेला न महसूस करे। डा. तिवारी ने कहा कि आज सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि परीक्षा दोबारा क्यों नहीं हुई, बल्कि यह भी है कि हमारा समाज अपने युवाओं को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए कितना मानसिक रूप से तैयार कर पा रहा है।






