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विधानसभा चुनाव से पहले सपा को बड़ा आघात, नहीं रहे रामगोविंद चौधरी

-हुआ निधन
-आठ बार विधायक रहे रामगोविंद चौधरी और एक बार संभाली नेता प्रतिपक्ष की भी जिम्मेदारी
-लखनऊ के पीजीआई में ली अंतिम सांस, पूरे प्रदेश में शोक की लहर

शशिकांत ओझा

बलिया : उत्तर प्रदेश विधानसभा में लंबे समय तक विधायक रहे राम गोविंद चौधरी का शुक्रवार को निधन हो गया, वे समाजवादी पार्टी के सीनियर नेताओं में एक थे। बलिया की राजनीति में उनका बड़ा स्थान था, वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। शुक्रवार की रात करीब 10:15 बजे उन्होंने लखनऊ के एसजीपीजीआई में आखिरी सांस ली।
सपा के वरिष्ठ नेता रामगोविंद चौधरी का नाम बलिया की राजनीति के साथ-साथ यूपी विधानसभा की राजनीति में भी लंबे समय से जुड़ा रहा है। समाजवादी पार्टी अभी यूपी चुनाव 2027 की तैयारियों में जुटी है। इस बीच सीनियर नेता के निधन से पार्टी का बड़ा आघात लगा है।

रामगोविन्द चौधरी रहे आठ बार विधायक

राम गोविंद चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी। उन्होंने करीब पांच दशकों से अधिक समय तक चुनावी राजनीति में भाग लिया। इस दौरान वे आठ बार विधायक चुने गए। अखिलेश यादव ने उन्हें वर्ष 2017 में यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया था। राम गोविंद चौधरी का जन्म 7 सितंबर 1953 को बलिया के गोसाईपुर गांव में हुआ था। रामगोविंद चौधरी के पिता का नाम स्व. द्वारिका चौधरी था। पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने स्नातक के बाद एलएलबी की शिक्षा हासिल की थी। यूपी विधानसभा के रिकार्ड में उनकी शैक्षणिक योग्यता स्नातक और एलएलबी दर्ज है। वे पेशे से अधिवक्ता थे। राजनीति में आने से पहले उन्होंने छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

आपातकाल में गए थे जेल

रामगोविंद चौधरी मुरली मनोहर टाउन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान छात्रसंघ की राजनीति में सक्रिय हुए। इसके बाद वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन में शामिल हो गए। छात्र आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण आपातकाल के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। इसके बाद उनका नाम राजनीतिक मैदान में गूंजने लगा।

संघर्ष से समाजवाद तक की एक अविराम यात्रा

जिसने छात्र जीवन में अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना सीखा, उसने पूरी जिंदगी समाज के कमजोर और वंचित तबके की आवाज बनने का संकल्प निभाया। 9 जुलाई 1953 को जन्मे रामगोविन्द चौधरी जी राजनीति की यात्रा किसी पद या प्रतिष्ठा की तलाश से शुरू नहीं हुई थी। यह यात्रा शुरू हुई थी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के साहस से, छात्र हितों के लिए संघर्ष से और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से। तीन भाइयों में सबसे बड़े रामगोविन्द चौधरी ने अपने जीवन के प्रारंभिक संस्कार गांव की मिट्टी और सामान्य परिवेश से प्राप्त किए। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से तथा स्कूली शिक्षा सिकन्दरपुर में प्राप्त करने के बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए सतीश चंद्र कॉलेज में बीएससी में प्रवेश लिया। लेकिन पढ़ाई के साथ-साथ छात्र समस्याओं ने उन्हें बेचैन किया। छात्रों के अधिकारों और समस्याओं के समाधान के लिए वे आंदोलनों में सक्रिय हुए। संघर्ष का परिणाम यह हुआ कि उन्हें महाविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। मगर यह निष्कासन उनके कदम रोक नहीं सका। उन्होंने श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया में प्रवेश लिया और यहीं से उनकी छात्र राजनीति ने जनआंदोलन का रूप लेना शुरू किया। वर्ष 1972 में वे टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री निर्वाचित हुए। वर्ष 1974 में छात्रों ने उन्हें पुनः अपना नेता चुना और वे छात्रसंघ अध्यक्ष निर्वाचित हुए। विधायक रहते कानून की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से हासिल किय। यह वह दौर था जब देश का लोकतंत्र एक कठिन परीक्षा से गुजर रहा था। आपातकाल के समय रामगोविन्द चौधरी जी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का रास्ता चुना। जेपी आंदोलन के दौरान वे जनपद छात्र युवा वाहिनी के सह-संयोजक रहे। उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित किया गया। आंदोलन के दौरान टीडी कॉलेज परिसर से उनकी गिरफ्तारी हुई। लगभग 24 महीने तक जेल में रहने के बाद जब वे बलिया जेल से बाहर निकले तो उनके सामने जीवन का एक नया अध्याय इंतजार कर रहा था। उनकी रिहाई का दिन भी ऐतिहासिक संयोग लेकर आया। उसी दिन बलिया कलेक्ट्रेट में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन करने पहुंचे थे। रामगोविन्द चौधरी के साथ उमड़ा छात्रों का हुजूम देखकर चंद्रशेखर ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया। यही मुलाकात आगे चलकर आत्मीय संबंध और राजनीतिक मार्गदर्शन का आधार बनी। एक संघर्षशील छात्र और एक बड़े समाजवादी चिंतक का यह मिलन रामगोविन्द चौधरी के राजनीतिक जीवन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

विधानसभा से जनसेवा के व्यापक मंच तक

वर्ष 1977 में उन्होंने तत्कालीन चिलकहर विधानसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और जनता का विश्वास प्राप्त किया। इसके बाद लगातार पांच बार उन्होंने उस क्षेत्र का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया। राजनीति में उनका उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं था। वे राजनीति को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और उसकी आवाज को सत्ता के गलियारों तक ले जाने का माध्यम मानते रहे। वर्ष 1991 में उन्हें मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने शासन के स्तर पर अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2000 में वे समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने। वर्ष 2002 में बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में, समाजवादी पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ा और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री बच्चा पाठक को लगभग 6,000 मतों से पराजित कर विधानसभा पहुंचे। वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में उन्हें बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। राजनीतिक जीवन में पराजय भी आई। वर्ष 2007 में वे बांसडीह से लगभग 264 मतों के अंतर से चुनाव हार गए। लेकिन जिनके जीवन की बुनियाद ही संघर्ष पर टिकी हो, उनके लिए पराजय अंतिम पड़ाव नहीं होती। वर्ष 2012 में उन्होंने फिर विजय प्राप्त की और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में बेसिक शिक्षा तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के कैबिनेट मंत्री बने। बाद में समाज कल्याण और पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली। वर्ष 2017 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी केतकी सिंह को लगभग 1,655 मतों से पराजित किया। इस विजय के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विरोधी दल की जिम्मेदारी मिली।

फैसले जो याद किए जाते हैं

रामगोविन्द चौधरी की पहचान केवल एक विधायक या मंत्री के रूप में नहीं रही। उनके कार्यकाल के कई निर्णय सीधे शिक्षक, शिक्षा और ग्रामीण लोकतंत्र से जुड़े रहे। बेसिक शिक्षा मंत्री के रूप में शिक्षकों के खातों में सीधे ऑनलाइन वेतन भेजने की व्यवस्था, शिक्षामित्रों के समायोजन तथा सहायता प्राप्त जूनियर हाई स्कूलों में पदों से अधिक कार्यरत शिक्षकों के अधिसंख्य पदों पर समायोजन जैसे फैसले उनके कार्यकाल की महत्वपूर्ण पहलों में गिने जाते हैं। पंचायती राज मंत्री के रूप में ग्राम प्रधानों और ब्लॉक प्रमुखों को मानदेय देने की व्यवस्था भी उनके महत्वपूर्ण निर्णयों में रही।